राजा विक्रमादित्य का इतिहास | vikramaditya in hindi

Raja vikramaditya

 हमारा भारत देश ऐसा देश है जहां पर हमेशा से ही  हमारे संस्कार, संस्कृति और मान्यताओं को महत्व दिया गयाा है। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष का नाम सम्मान और स्नेह के साथ लिया जाता है। देेश की मान्यताओं को बरकरार रखनेेे के लिए भारत के प्राचीन राजा महाराजाओं  का विशेष योगदान  है जिन्होंने भारत की परंपराओं को बरकरार रखने का काम  किया है इनमें से एक मुख्य राजा है vikramaditya।

आज हम आपको राजा विक्रमादित्य के बारे में सारी जानकारी विस्तार से बताने जा रहे हैं जिससे आपको इतिहास के बारे में सही जानकारी मिल सके।

 राजा विक्रमादित्य का जन्म

vikramaditya in hindi

Raja vikramaditya का जन्म 3000 वर्ष पूर्व 101 ईसा पूर्व हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गंधर्व सेन था एवं माता का नाम श्रीमती सौम्य दर्शना था जिन्हें वीरमति और मदन देखा भी कहा जाता था। राजा विक्रमादित्य की एक बड़ी बहन मैनावती थी और उनके भाई भर्तृहरि,  शंख आदि थे। विक्रमादित्य बचपन से ही अपने ज्ञान, वीरता और उदार शीलता के लिए प्रसिद्ध थे और वे अपने परिवार में सब के दुलारे थे।

    विक्रमादित्य का पारिवारिक परिचय

 vikramaditya को लोग हमेशा का परिचायक समझते हैं। लेकिन उनकी पारिवारिक जीवन के बारे में कम ही लोगों को पता है उन की 5 पत्नियां थी मलावती, मदन लेखा, पद्मिनी, चेल्ल  और चिलम महादेवी। उनके दो पुत्र हुए जिनका नाम विक्रम चरित और विनय पाल रहा साथ ही साथ दो पुत्रियां जिन्हें विद्योत्तमा और वसुंधरा कहा गया। विक्रमादित्य के राजपुरोहित के रूप में श्री विक्रम और वसुमित्र थे जो हमेशा उनका साथ देते थे।

विक्रमादित्य का जनता के प्रति प्रेम

Raja vikramaditya हमेशा अपनी जनता के प्रति विशेष लगाव रखा करते थे और समय-समय पर उनका हालचाल जरूर लिया करते थे। वे अपने नगर में कुछ जासूसों को छोड़ दिया करते थे ताकि वह आकर उन्हें उनकी जनता का हाल-चाल दे सकें। कई बार तो राजा विक्रमादित्य खुद ही वेश बदल कर अपनी जनता के बारे में जानकारी प्राप्त करते थे। उन्होंने कभी भी अपनी जनता को किसी भी चीज की कमी नहीं महसूस होने दी और किसी भी प्रकार की दिक्कत होने पर उसे पूर्ण रूप से दूर करने का प्रयास किया। कभी भी अपने राज्य में अन्याय सहन नहीं करते थे और हमेशा जनता की भावना को समझ कर आगे बढ़ते थे। Swami Vivekananda जी का जीवन परिचय

 जब उन्होंने दिया था अपने भाई का साथ

Raja vikramaditya हमेशा अपने भाइयों का साथ देते नजर आते थे। उनके छोटे भाई  भर्तृहरि का मालवा में शासन था और उस समय उन्हें विक्रमादित्य की मदद की जरूरत पड़ी। एक बार की बात है जब भर्तृहरि के शासनकाल में शक राज्यों का आक्रमण बढ़ गया था और उस समय भर्तृहरि ने वैराग्य धारण कर लिया था साथ ही साथ अपने राज्य का भी त्याग कर दिया था ऐसे में vikramaditya ने आकर अपने भाई की सेना को संभाला और आक्रमणकारियों को बाहर खदेड़ दिया था इसके बाद vikramaditya की दूसरे राज्यों में भी जय जयकार होने लगी थी। उन्होंने भारत भूमि से विदेशों को दूर करने के लिए भी कई प्रकार की रणनीति बनाई जिसके तहत काम करते हुए उन्हें सफलता भी मिली।

  राजा विक्रमादित्य की विशेषता

Raja vikramaditya को हमेशा उनकी  जनता का प्यार और दुलार मिलता रहा है। विक्रमादित्य उज्जैन के राजा थे और ज्ञान, वीरता और उदार शीलता के लिए  उनके काम को सराहा गया। सम्राट विक्रमादित्य शकों को पराजित करते हुए आगे बढ़े थे और इस वजह से उन्हें महान सम्राट की उपाधि दे दी गई थी। विक्रमादित्य की उपाधि कुल 14 भारतीय राजाओं को दी गई। जिनमें गुप्त सम्राट, चंद्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचंद्र, विक्रमादित्य मुख्य हैं।

 क्या होता है विक्रमादित्य का अर्थ

vikramaditya का मतलब बहुत ही खास होता है। उनका नाम विक्रम और आदित्य से मिलकर बना हुआ है जिसका मतलब होता है पराक्रम का सूर्य या फिर सूर्य के समान और यही वजह है कि वे बहुत पराक्रमी, साहसी और निडर बने।

  विक्रमादित्य के नवरत्न

vikramaditya के दरबार में ऐसे नवरत्न हुए जिन्होंने हमेशा उनके राज दरबार की शोभा बढ़ाई उनमें से नवरत्नों के रूप में परंपरा के अनुसार धनवंतरी, क्षपनक ,अमर सिंह, शंकु, खटकर पारा, कालिदास ,बेतालभट्ट ,वर रुचि  और वराहमिहिर रहे यह सभी उज्जैन में स्थित विक्रमादित्य के राज दरबार का हिस्सा थे। उनकी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राजा अकबर ने भी अपने राज दरबार में नवरत्न की घोषणा की थी।

 शनिदेव की चुनौती किए थे स्वीकार

Raja vikramaditya कभी भी ग्रह नक्षत्रों पर भरोसा नहीं करते थे लेकिन जब एक बार उनके  राज दरबार मैं ग्रह नक्षत्र पर विशेष चर्चा हो रही थी उस समय यह बताया गया था कि उनकी कुंडली के बारह भाव में शनि बैठा है इसका मतलब यह है कि उनके कुंडली में शनि का भाव सही नहीं है लेकिन इस बात को विक्रमादित्य ने नहीं माना और उन्होंने खुलेआम शनिदेव की चुनौती को स्वीकार कर लिया उनके ऐसा करने पर शनि देव को भी क्रोध आया लेकिन उन्होंने भी उनकी परीक्षा लेने का मन बनाया।

एक बार की बात है जब उनके महल में एक घोड़ा बेचने वाला आया तब उन्होंने उससे घोड़ा खरीदने की बात कही। घोड़ा बेचने वाले ने उन्हें अपने घोड़े की बहुत सारी विशेषताएं बताते हुए कहा कि वह उस घोड़े पर सवारी ही आसमान में कर सकते हैं। लेकिन राजा vikramaditya को उसकी बात पर भरोसा नहीं हुआ और उन्होंने कहा कि उसे खरीदने के पहले  उस घोड़े की सैर करना चाहते हैं। जैसे ही वे घोड़े पर बैठते हैं तो पहले ही छलांग में घोड़ा आसमान की ओर कूदने लगता है और लेकिन अगले ही पल जमीन की ओर नहीं आता और सीधे किसी जंगल में छलांग लगा देता है जिससे विक्रमादित्य वहीं पर गिर जाते हैं और वापस आने का रास्ता ढूंढने लगते हैं रास्ते में कुछ डाकू ने मिल जाते हैं जो उनका मुकुट और जेवरात चुरा कर ले जाते हैं उस पर भी  उन्हें बुरा नहीं लगता और धैर्य के साथ सोचते हैं कि आगे क्या कर सकते हैं?  दरअसल यह सब शनि देव के द्वारा बनाया गया षड्यंत्र था लेकिन उनकी हिम्मत देखते हुए शनिदेव ने भी हार मान ली और राजा विक्रमादित्य ने भी अपनी वापसी का रास्ता सही तरीके से चुन लिया था।

 विक्रम संवत के असली प्रवर्तक

आज तक देश में ऐसे महान विद्वान हुए हैं जिन्होंने विक्रम संवत् को ही प्रवर्तित मानते हुए आगे बढ़ते हैं। विक्रम संवत की पुष्टि एक विशेष ग्रंथ से होती है जो कि 3068 कली अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कली 57 ईसा पूर्व  विक्रम संवत की शुरुआत की थी।

 विक्रमादित्य की मौत के बाद का रोचक किस्सा

राजा विक्रमादित्य के पास कई सारे ऐसे गुण थे जिनकी बदौलत उन्होंने अपनी जनता के दिल में राज किया। मृत्यु लोक में जन्म लेने के कारण उन्हें अपनी अपने देह को त्याग करना पड़ा जिस पर देवताओं ने भी फूलों की वर्षा की और जनता का रो रो कर बुरा हाल हो चुका था।

उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे बड़े पुत्र को राज गद्दी पर बैठाया गया लेकिन जैसे ही वे गद्दी पर बैठते थे वैसे ही कुछ न कुछ ऐसा होता था कि मैं बैठ ही नहीं पाते थे सभी को ऐसा लगता था कि कोई अदृश्य शक्ति है जिसके बलबूते ही ऐसा हो रहा है। इस बात को लेकर सभी बहुत चिंतित थे कि तभी विक्रमादित्य अपने पुत्र के सपने में आए और उनसे कहा कि अगर वह सिहासन पर बैठना चाहते हैं तो उन्हें देवत्व को प्राप्त करना  होगा और जिस दिन वे इस लायक हो जाएंगे उस दिन विक्रमादित्य खुद आकर उन्हें बता देंगे इसके बाद पंडितों और विद्वानों से परामर्श करते हुए इस कार्य को आगे बढ़ाया गया और उसके बाद ही विक्रमादित्य के पुत्र इस गद्दी पर बैठ सके।

  अंतिम शब्द

इस प्रकार से हमने देखा कि राजा विक्रमादित्य ने हमेशा अपने देश और राज्य की भलाई के लिए कई प्रकार के कदम उठाएं और जिससे जनता को ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके। वह हमेशा अपने राज दरबार में समस्याओं को सुलझाने का काम किया करते थे जो हमारे लिए भी सीख है कि कभी भी समस्या को सुलझाने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। राजा विक्रमादित्य बेहद उदार किस्म के व्यक्ति थे जो हमेशा दूसरों की भलाई के काम करते रहे। इतिहास के पन्नों को खोल कर देखा जाए तो हमें उनसे काफी कुछ सीखने  को मिलेगा। 

उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह लेख पसंद आएगा लेख पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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