suryakant tripathi nirala – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

suryakant tripathi nirala  का जीवन परिचय

 हमारे देश में कई ऐसे हिंदी साहित्य के रत्न में मिलते है जिनके माध्यम से हमें नई-नई जानकारियां प्राप्त होती हैं और हमें उन साहित्य के बारे में भी पता चलता है|  कई बार हम इन्हीं जानकारियों से वाकिफ नहीं होते लेकिन जैसे-जैसे हिंदी साहित्य की और  हमारा कदम बढ़ता जाता है  जिससे हमें दिलचस्पी भी बढ़ जाती है|  इसके अलावा जिन लोगों को हिंदी साहित्य की सही जानकारी नहीं होती,   वह अपने ज्ञान को  बड़ा सकते हैं|  आज हम आपको हिंदी साहित्य के एक ऐसे अनमोल रत्न के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका नाम  उनकी दास्तां को बयां करता है और उनका नाम है सूर्यकांत त्रिपाठी निराला|

 आज हम आपको suryakant tripathi nirala के बारे में सारी जानकारी  विस्तृत से देने जा रहे हैं उम्मीद करते हैं आपको पसंद आएगी|

suryakant tripathi nirala निराला का जन्म

suryakant tripathi nirala

suryakant tripathi nirala का जन्म 21 फरवरी 1899  को बंगाल के मिदनापुर में हुआ था| उनकी माता का नाम श्रीमती रुकमणी त्रिपाठी और पिता का नाम पंडित राम सहाय त्रिपाठी था|  उनकी पत्नी का नाम मनोहरा त्रिपाठी था| उनके पिता उन्नाव के रहने वाले थे जहां पर एक सिपाही की नौकरी करते थे वैसे तो मूल रूप से वे लोग उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे जहां पर  एक गांव में निवास करते थे|  बहुत ही छोटी उम्र में उनकी माता का निधन हो गया था जिसके बाद उनके परिवार  की  कुछ जिम्मेदारी सूर्यकांत त्रिपाठी पर आ  गई  थी|

suryakant tripathi nirala की शिक्षा

वैसे तो suryakant tripathi nirala को पढ़ाई का शौक था और उनकी शिक्षा हाई स्कूल तक ही हो पाई थी। बाद में हिंदी, संस्कृत में स्वतंत्र रूप से अध्ययन प्राप्त किया था|  पिता की छोटी सी नौकरी होने पर परिवार को कई प्रकार की असुविधा होने लगी जिसके चलते त्रिपाठी को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी|  बावजूद इसके उन्होंने समय रहते  अपनी शिक्षा को  जारी रखने का काम किया|  छोटी सी उम्र में भी उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में सिद्धांत को त्यागे बिना अपने पथ पर आगे बढ़ते रहें| Read more श्री हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय

विशिष्ट कार्य क्षेत्र

श्री suryakant tripathi nirala का कार्य क्षेत्र  दिलचस्प रहा|  उन्होंने सर्वप्रथम महिषादल राज्य में नौकरी की उसके बाद 1918 से लेकर 1922 तक अपनी इस नौकरी को जारी रखा|  समय बीतने के साथ ही उन्होंने स्वतंत्र रूप से लेखन करने और संपादन करने का काम भी किया|  उसके बाद 1922 से 1923 तक कोलकाता में प्रकाशित समन्वय नाम का संपादन किया, उसके बाद 1923 अगस्त से’’ मतवाला’’ के संपादन मंडल में कार्य किया | इसके बाद लखनऊ आकर ‘’गंगा पुस्तक माला कार्यालय’’ में उनकी नियुक्ति कर दी गई जहां वे मासिक पत्रिका के अंतर्गत कार्य करने लगे। 1942 से लेकर अपनी मृत्यु होने पर इलाहाबाद में ही रहकर पत्र लेखन और अनुवाद करने का कार्य किया इसे लोगों द्वारा भी काफी पसंद किया गया| 

suryakant tripathi nirala की मृत्यु

अपने कार्य को अंजाम देते हुए 15 अक्टूबर 1961 को उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया जिसके बाद हिंदी साहित्य में उनके योगदान को भुला पाना  असंभव हो गया |

suryakant tripathi nirala की प्रमुख रचनाएं

 काव्य संग्रह 

  1. अनामिका [1923]
  2.  परिमल [1930]
  3.  गीतिका [1936]
  4.  तुलसीदास [1939]
  5.  कुकुरमुत्ता [1942]
  6.  अणिमा [ 1946]
  7.  बेला [1946]
  8.  नए पत्ते [ 1946]
  9.  अर्चना [ 1950]
  10.  आराधना [1956]
  11. गीत [ 1954]
  12.  अपरा

उपन्यास

  1.  अप्सरा [ 1931]
  2.  अलका [1933] 
  3. प्रभावती [1936]
  4.  निरुपमा [1936]
  5.   चोटी की पकड़ [ 1946]
  6.  काले कारनामे [ 1950]

कहानी संग्रह

  1. लिली [1934]
  2.  सखी [1935]
  3.  चतुरी  चमार [ 1945]
  4.  देवी [ 1948]

निबंध आलोचना

  1. रविंद्र कविता  कानन [ 1929]
  2.  प्रबंध  पद्य [ 1934]
  3.  प्रबंध प्रतिमा [ 1940]
  4.   चाबुक [ 1942]
  5.  चयन [ 1957]
  6. संग्रह [ 1963]

बाल उपयोगी साहित्य

  1.  भक्त ध्रुव [ 1926]
  2.  भक्त प्रहलाद [1926]
  3.  भीष्मा [ 1926]
  4.  महाराणा प्रताप [ 1927]

अनुवाद

  1. रामचरितमानस [1948]
  2.  आनंद मठ
  3. विष वृक्ष
  4. कृष्णकांत का वसीयतनामा
  5.  कपालकुंडला
  6.  दुर्गेश नंदिनी
  7.  राज सिंह
  8.  राजरानी
  9.  देवी चौधुरानी
  10.  चंद्रशेखर
  11.  रजनी
  12.  परिव्राजक
  13.  भारत में विवेकानंद
  14.  राजयोग

निराला नाम से कैसे हुए प्रसिद्ध

suryakant tripathi nirala के नाम  में निराला नहीं लगा हुआ था|  यह काफी पुरानी बात है जब  कोलकाता में ‘’मतवाला’’ नामक प्रसिद्ध पत्रिका  में काम किया करते थे|  1 दिन की बात है 1923 में निराला जी की एक बेहतरीन काव्य रचना’’ जूही की कली’’ छपी हुई थी इसमें उनका पूरा नाम श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला लिखा  गया था|  उसके बाद से ही उनके नाम के आगे ‘’निराला’’ लगाया गया|  उनकी लेखन कला को देखते हुए और उनकी जिद के कारण ही  गंगा प्रसाद पांडे ने निराला को महाप्राण कहा था|

उनकी विभिन्न भाषा शैली

श्री suryakant tripathi nirala की हर रचना को लोगों का बहुत प्यार मिला है|  इस वजह से उनकी रचनाओं के प्रशंसकों की संख्या हजारों में है| उनकी भाषा शैली  बहुत ही उम्दा होती थी|  जिसमें  संगीत आत्मकता  और  औज  को विशेष रूप से देखा जा सकता है|  उनकी कहानी, उपन्यास,  काव्य, निबंध सभी   ने  लोगों के दिल में अमिट छाप छोड़ी है|  उनकी कविताओं में हमेशा खड़ी बोली का ही इस्तेमाल किया जाता रहा है जिससे लोगों में खड़ी बोली के प्रति सम्मान देखा गया है| उनकी भाषा शैली हमेशा ही अनुपम होती है| साथ ही साथ उनकी सामंतवादी सोच का भी असर दिखाई देता है|इन्हें हमेशा प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, और नए काव्य के जनक के रूप में जाना जाता था। इनकी सरस्वती वंदना आज भी लोगों को याद है और स्कूलों में इनका गायन किया जाता है। लोग तो इन्हें सरस्वती पुत्र, महाकवि जैसे संबोधन से भी बुलाते थे। 

उनके कार्यों की सबसे खास बात उनका चित्रण कौशल था|  उनकी रचनाओं में ऐसा जीवंत चित्रण मिलता था जिससे यह सत्य  घटना प्रतीत होती थी| उन्होंने हमेशा यथार्थवाद को प्राथमिकता दी है और होने वाली विभिन्न   स्थितियों का  चित्र  बखूबी दिखाया है|

उनकी कविता के कुछ प्रमुख अंश

  नेह निर्झर  बह गया है

 नेह निर्झर बह गया है,  रेत जो तन रह गया है

  आम की यह डाल जो सूखी दिखी, कह रही है

अब यहां पिक  या  सीखें

 नहीं आते,  पंक्ति में वह हूं लिखी  नहीं जिसका

 अर्थ जीवन दल गया है

 दिए हैं मैंने जगत को  फूल फल,  किया है अपनी

 प्रतिभा से चकित चल

 पर अनश्वर था  सकल   पल्लवित   पल  ठाट  जीवन

का वही जो  गया है

 अब नहीं आती कुलीन पर प्रियतमा श्याम चरण

 पर बैठने को निरूपमा

 कह रही है   दिल पर केवल  आम मैं अलग हूं

 यह कविता गया है

 आई याद बिछड़न से मिलन की मधुर बात

 याद चांदनी की धुली हुई  

आई  याद कांता की कमनीय बात

 फिर क्या?  पवन  उपवन सर  सरित गिरि कानन

जाने कहो  कैसे प्रिय आगमन  वह

 नायक ने  चूमे कपोल

 डोल  उठी बेल्लारी की,   लड़ी जैसे  हिंडौन

 इस पर भी  जागी नहीं,  जो क्षमा मांगी नहीं|

कविताओं की काव्यगत विशेषताएं

उनकी कविताओं में कई प्रकार की विशेषताएं देखी जाती थी जिनमें से काव्यगत विशेषता प्रमुख रूप से देखी गई है|  इन विशेषताओं को कई रूपों में बांटा गया है|

  • भाव पक्ष — इनके कविताएं हमेशा हमें अलग ही उन्माद में ले जाती थी। हमेशा इनके काव्य में हमें भाषा भाव और छंद का समन्वय प्राप्त होता है। निराला के काव्य में हमेशा दार्शनिक विचारधारा लोगों को प्रभावित करती थी,  जिसमें बुद्धिमान और हृदय के सुंदर समन्वय का समावेश है|  साथ-साथ इनके भाव पक्ष में छायावाद, रहस्यवाद और प्रगति बाद मुख्य रूप से देखा गया है|  छायावादी कवि होने की वजह से निराला का प्रकृति से अटूट प्रेम उनकी हर कविता में दिखाई दे जाता है|  प्रकृति का चित्रण करना कभी भी नहीं बोलते थे और उन्होंने जिसे स्वीकार भी किया है|
  • रस छंद अलंकार– निराला के काव्य में हमेशा आपको श्रृंगार वीर,  रुद्र और हास्य रस का  समावेश देखने को मिल जाता है। जिसे बहुत ही स्वाभाविक ढंग से दर्शाया गया है उन्होंने हमेशा भिन्न-भिन्न छंदों का भी इस्तेमाल किया है। साधारण रूप से उन्होंने तुकांत, अतुकांत का उपयोग किया है |  हर प्रकार के छंद में उन्होंने ध्वनि का खास ध्यान रखा है|  अलंकारों के लिए भी निराला की कविता   मैं खास जगह देखी गई है| 
  • कला पक्ष– उनकी कविता की भाषा खड़ी बोली में होती थी। जिसमें कभी-कभी बांग्ला भाषा का भी इस्तेमाल किया जाता था। गौर से देखने पर समझ में आता था कि इसमें उन्होंने उर्दू और फारसी के शब्दों का भी समावेश किया हुआ है|  उनके द्वारा उपयोग की गई भाषा सरल, अर्थपूर्ण और मुहावरे वाली होती थी|  जिनकी  शैलियों को कई प्रकार से विभाजित करके कविताओं का निर्माण करते थे|

साहित्य में उनका स्थान

suryakant tripathi nirala जी को हमेशा से ही हिंदी साहित्य का चमकता सितारा माना गया है, वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे साथ ही साथ एक महान साहित्यकार भी है|  समय के साथ-साथ उन्होंने अपनी कविताओं और रचनाओं में छायावाद, रहस्यवाद और प्रगतिवाद के दर्शन दिए हैं। इस वजह से साहित्य में उनका स्थान उच्च है|  उन्होंने भारतीय संस्कृति को भी अपनी कविताओं में स्थान दिया है और इस वजह से भी उनकी इज्जत की जाती है|

उनके जीवन में आया था विशेष मोड

हर इंसान के जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जिसके बाद जिंदगी लड़खड़ाते हुई महसूस होती है उसी प्रकार से suryakant tripathi nirala की जिंदगी में भी एक नया मोड़ आया जिसके बाद उनकी जिंदगी बिखर गई थी|  सन 1918 में जब इन्फ्लूएंजा की चपेट में आकर उनकी  पत्नी का स्वर्गवास हो गया था और धीरे-धीरे उनके परिवार के सदस्य भी इस बीमारी के शिकार हो गए थे|  जिसके बाद उनके पास अपना जीवन चलाने के साधन खत्म हो चुके थे और यह उनके जीवन का सबसे कठिन मोड कहा जा सकता है| 

अंतिम शब्द

प्रकार से हमने जाना कि suryakant tripathi nirala जी बेहद उम्दा  कवि और लेखक के रूप में जाने जाते हैं।आज भी उनके द्वारा रचित रचनाओं को  लोग बड़े ही प्रेम और सौहार्द के साथ पढ़ते हैं|  इनकी कई सारी कविताओं और लेखक का जिक्र  स्कूली पाठ्यक्रम में ही किया जाता है जिससे बच्चे भी हमारे देश के इस सितारे के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें|  सरल स्वभाव और उचित भाषा शैली के प्रयोग से हमेशा वे लोगों के दिल में बने हुए हैं|  इनकी रचनाओं को पढ़कर हम  साहित्य के बारे में भी ज्ञान अर्जित कर सकते हैं और अपनी भावी पीढ़ी को भी इस ज्ञान से वाकिफ करा सकते हैं|

 उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह लेख पसंद आएगा धन्यवाद| 

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