Raskhan | रसखान का जीवन परिचय

रसखान का जीवन परिचय

भारत के इतिहास में कई सारे ऐसे मुसलमान कवियों ने जन्म लिया है जिन्होंने ना सिर्फ  खुद के धर्म की  बल्कि दूसरे धर्मों के बारे में भी उचित मार्गदर्शन लोगों को दिया है जिसकी वजह से लोगों में जागरूकता देखी गई है|  जिनमें से कुछ कवियों ने कृष्ण भक्ति के बारे में भी लोगों को जागरूक किया है और इस भक्ति में खुद को भी तल्लीन कर दिया है| इन कवियों ने भारत में  कविता के महत्व को बताया है साथ ही साथ  अपनी कविताओं से लोगों का दिल जीता है|  आज हम आपको महान कवि के बारे में बताने जा रहे हैं उनका नाम है Raskhan|

रसखान का जन्म

Raskhan

 Raskhan का जन्म 1548 ईस्वी में पिहानी भारत में हुआ था।  वे एक हिंदी के कवि थे जिन्होंने कृष्ण भक्ति में लीन होकर अपनी रचनाओं को लिखा है। वे  देवनाथ के शिष्य थे एवं वल्लभ संप्रदाय के सदस्य भी थे। उनके जन्म से संबंधित कुछ विद्वानों में विवाद देखा गया है क्योंकि उनकी सही जन्मतिथि आज तक ज्ञात नहीं है|  वह एक मुस्लिम कवि थे और हमेशा कृष्ण भक्ति से रचित रचना ही लिखा करते थे| रसखान के पिता  एक जागीरदार  रहे और यही वजह थी कि उनका बचपन बहुत ही लाड प्यार में बीता|  इनका असली नाम सैयद इब्राहिम  है।

शिक्षा

क्योंकि Raskhan एक जागीरदार के बेटे थे इसीलिए उनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत ही अच्छे तरीके से की गई थी|  रसखान को   फरसि, हिंदी एवं संस्कृत की शिक्षा दिलाई गई थी।  इस वजह से उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता को फारसी में अनुवाद किया था|  जैसे जैसे समय बढ़ता गया उन्होंने अपने शिक्षा दिक्षा पर ध्यान दिया और जिसका असर उनकी रचनाओं में भी देखा गया है|

रसखान की मृत्यु

महान कवि Raskhan की मृत्यु के बारे में आज तक कोई भी प्रमाणित सबूत प्राप्त नहीं हुआ है और किसी भी प्रकार के तत्व नहीं मिलते हैं जिसमें उनके मृत्यु के बारे में बताया गया हो|  इस वजह से हमें रसखान की मृत्यु के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त नहीं है|

रसखान की प्रमुख रचनाएं

  1. सुजान रसखान
  2.  प्रेम वाटिका
  3.   बाल लीला 
  4. रासलीला
  5.    कुंज लीला

रसखान के कृष्ण भक्ति

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भक्ति युग को हमेशा से ही स्वर्णिम युग के नाम से जाना जाता है इस युग में कई सारे महान कवियों ने अपने कृष्ण भक्ति  या देवी भक्ति के बारे में कई सारी रचनाएं लिखी हैं जिनमें से प्रमुख  नाम   तुलसीदास, सूरदास,  कबीर दास, रसखान, मलिक मोहम्मद जायसी, विद्यापति, है|  रसखान कृष्ण भक्ति के लिए जाने जाते थे|   उन्होंने हमेशा श्री कृष्ण के निराकार रूप की पूजा की है और अपनी रचनाओं से कृष्ण जी की लीलाओं का बेहतरीन वर्णन किया है|

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रसखान की भाषा शैली

 Raskhan की भाषा शैली बहुत ही सरल होती थी,  जिन में ब्रजभाषा का उपयोग किया जाता था|  उन्होंने अपनी इस भाषा में किसी भी प्रकार का बदलाव ना करते हुए अपने तरीके से ही रचनाओं को वर्णित किया है जिसे लोगों द्वारा पसंद किया गया है। उनके द्वारा लिखी गई रचनाओं को बहुत ही सीधे शब्दों में व्यक्त किया गया है जिससे उनके अर्थ को समझना मुश्किल नहीं होता  है|  रसखान के पहले भी कई कवियों ने ब्रज भाषा का उपयोग किया है लेकिन  रसखान के आने के बाद  इस  शैली में एक अलग परिवर्तन देखने को मिला है| इन्होंने कहीं कहीं पर यमक और अनुप्रास अलंकार का इस्तेमाल किया है जिससे उनकी रचना आकर्षक लगे|  साथ ही साथ रचनाओं में मुक्तक छंद शैली का इस्तेमाल किया गया है जिसे समझना आसान हो|

रसखान के महत्वपूर्ण दोहे

 Raskhan ने कई सारे दोहे लिखे हैं जो आज भी पसंद किए जाते हैं जिनमें से हम आपको उनके प्रमुख  दोहे के बारे में बताने जा रहे हैं|

1] देखे हो रूप अपार, मोहन सुंदर श्याम को

       वह ब्रज  राजकुमार,  जीय  नैनी में  बसयो

 अर्थ- इस दोहे में कवि Raskhan द्वारा कहा गया है कि बहुत ही सुंदर ब्रज के राजकुमार श्री कृष्णा उनके ह्रदय मन,  स्वभाव में बसे हुए हैं और उनकी आंखों में निवास कर रहे हैं|

2] मोहन छबी रसखानी, अब अपने नाही

       ऊंचे आवत धनुस,  से छूटे  सर से जाही|

अर्थ–  इस दोहे में  कवि Raskhan कहते हैं श्री कृष्ण छटा देखने के बाद  अब आंखें नहीं रह गई हैं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार धनुष से एक बार  तीर  छूट जाने के बाद वापस नहीं आ सकता  और फिर उसके दोबारा आने की कोई गुंजाइश नहीं बचती है|

3] अरे अनोखी बाम तू , आई गौने नइ,

          बाहर धरसि  ना  पाम है.  छलिया तू तक में|

 अर्थ– इस दोहे का अर्थ रसखान ने बताया है कि अरे सुंदरी तुम नई नवेली दुल्हन हो जो   गौना करा कर आई हो क्या तुम्हें श्री कृष्ण  के बारे में मालूम है?  अगर तुम घर के बाहर पैर रखोगे तो समझ लो  वह छलिया कृष्ण तुम्हारी ही ताक में बैठा है और पता नहीं कब तुम्हें अपने प्रेम के जाल में फंसा देगा|

4] प्रीतम नंदकिशोर जा, दिन नैनो लागे हो

         मन पावन चितचोर पत्रक,  औ नहीं सही  सको|

अर्थ — इस दोहे के अनुसार Raskhan जी कहते हैं जब से मेरी आंखें मेरे प्रियतम श्री कृष्ण से मिली है तब से मेरा मन पवित्र हो चुका है और अब मेरा मन श्रीकृष्ण की भक्ति के अलावा और कहीं नहीं लगता है और हमेशा मुझे  श्री कृष्ण की याद सताती है। 

5] मो मन मानी लाएं, गायो चीता चोर नंद नंद

        अब  बेमन मैं क्या करूं,  परी फेर के फंद|

अर्थ–  भगवान श्री कृष्ण के प्रति कवि ने अपनी प्रेम भावना को उजागर करते हुए कहा है कि मेरे मन का रत्न तो चित्र को चुराने वाले नंद  के पास है|  मेरा मन तो श्री कृष्ण ही ले गए हैं अब क्या करूं ? अब मेरे पास कृष्ण के प्रति समर्पण करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है और इसलिए मैं खुद को श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन करना चाहता हूं| 

रसखान के जीवन की सच्चाई

 Raskhan का पूरा नाम  सैयद इब्राहिम   रखा   गया था और ऐसा माना जाता था कि वे  काफी पहले एक  बनिए के लड़के पर अत्यंत आसक्त हो चुके थे|  हमेशा उसके साथ रहते और उसका झूठा भी खा लेते थे उसी समय किसी ने कहा कि हमें अपने इश्वर पर इस प्रकार की श्रद्धा रखनी चाहिए जिस प्रकार रसखान  ने उस बनिए के लड़के पर रखी है|  यह बात रसखान ने सुन ली। उन्होंने बात करने वालों से पूछा कि श्री कृष्ण का रूप कैसा दिखाई देता है? इस बात के जवाब पर उन्हें  श्री कृष्ण का चित्र दिखाया गया और अनुपम चित्र को देखकर ही रसखान का ह्रदय श्री कृष्ण की भक्ति में लीन हो गया जहां भी जाते हमेशा चित्र को साथ में रखते और उनके बारे में लोगों को सकारात्मक बातें बता देते, जिससे रसखान की  प्रसिद्धि हुई|

अंतिम शब्द

इस प्रकार से हमने जाना  रसखान  लोगों के बीच में श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए जाने जाते हैं  जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग करके कृष्ण की सेवा में  मन को लगाया|  आज भी हम रसखान के बारे में  विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करते हैं और उनके बारे में विस्तार से जानकारी हासिल करते हैं|  उनकी भक्ति भावना को देखकर ऐसा महसूस होता है कि किसी भी  महान  भक्तों  में इस प्रकार की भावना अवश्य होनी चाहिए जिससे ईश्वर के प्रति हम अपने  प्रेम को प्रदर्शित  कर  सके और उन्हें अपना सर्वे सर्वा मान सकें|

 उम्मीद करते हैं आपको हमारा यह लेख पसंद आएगा धन्यवाद| 

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