kabir das ke dohe | कबीर के 20 बेहतरीन दोहे

कबीर के 20 बेहतरीन दोहे  kabir das ke dohe

आज से पहले  भारत में कई ऐसे कवियों ने जन्म लिया, जिनके माध्यम से  हिंदी साहित्य का बेहतर  दिखाई देने लगा| इन कवियों के माध्यम से उस समय के भक्ति धारा के बारे में पता चलता है साथ ही साथ परमेश्वर में असीम विश्वास को भी दिखाया जाता है|  ऐसे  में हमें एक महान संत और कवि की जानकारी प्राप्त होती है, जो हमें भक्ति से संबंधित सारी  बातों को दर्शाते हैं और उन महान हस्ती का नाम है कबीर ( kabir das ) | साईं बाबा का इतिहास क्या है? Hindi positive thought

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कबीर का जीवन परिचय ( kabir das ke dohe

kabir das ke dohe

 ऐसा माना जाता था कि प्राचीन काल से ही मुगलों के समय में काफी तनाव और खूब लड़ाई झगड़ा होता था और उस माहौल में कई प्रकार के ऐसे संत हुए जिन्होंने  समाज की भलाई में अपना कदम उठाया ऐसे में कबीर ( kabir Das ) ने भी लोगों के बीच में एक अलग ही प्रकार की धूनी रमाई जिसके कारण कई लोगों के बीच में  वे  प्रसिद्ध हो गए थे हालांकि इस बात की जानकारी नहीं है कि वह हिंदू है मुसलमान है या फिर सिख  है या इसाई 

एकता की भावना को रखा बरकरार ( kabir das ke dohe

 उन्होंने लोगों के बीच में भेदभाव  को दूर रखने और एकता को बनाए रखने का बेहतर प्रयास किया उनकी वाणी सुनते ही लोग उनके दीवाने हो जाया करते थे और लोगों को उनसे प्रेम हो जाता था। उन्हें हमेशा विद्रोही माना जाता था जिसमें वे  दोहे के माध्यम से  लोगों का ध्यान आकर्षित करते थे|

कबीर के कुछ मुख्य दोहे ( kabir das ke dohe

1] गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय

      बलिहारी गुरु आपने,  गोविंद दियो मिलाय।

 अर्थ– इस दोहे में कबीरदास जी ( kabir das ke dohe ) कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हो जाते हैं, तो आप किस के चरण स्पर्श करेंगे?  गुरु  ने  अपने  ज्ञान से ही भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए|

2] ऐसी वाणी बोलिए,  मन का आपा खोए

औरन को शीतल करें, आप हो शीतल होय|

 अर्थ– इस दोहे में कबीरदास जी ( kabir das ke dohe ) कहते हैं कि इंसान को हमेशा ऐसी भाषा बोली चाहिए जो सुनने वाले के मन को अच्छी लगे|  ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो  अच्छी लगती है साथ ही साथ खुद को भी बहुत अच्छा महसूस होता है|

3] बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजू

पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर|

 अर्थ– इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ बेशक बहुत ज्यादा बड़ा होता है लेकिन कभी वह किसी को छाया नहीं दे पाता है और फल भी बहुत ऊंचाई पर लगते हैं जिससे कोई भी उनका इस्तेमाल नहीं कर पाता है| इसी प्रकार अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे हैं, तो इस प्रकार से बड़ा होने का आपको कोई फायदा नहीं मिलने वाला है|

4]निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय|

 अर्थ– इस दोहे में कबीर जी कहते हैं कि निंदक हमेशा दूसरों की बुराइयां करने वाले लोगों को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग अगर आपके पास रहेंगे तो आपकी बुराइयां दूसरों को बताते रहेंगे और आप आसानी से अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं इसलिए ऐसा कहा गया है कि निंदक लोग इंसान का स्वभाव अच्छा और शीतल बना देते हैं|

5] बुरा जो देखन मैं चला,  बुरा न मिलिया कोय

      जो मैंने देखा आप ना,  मुझसे बुरा न कोई|

 अर्थ– कबीर जी ने इस दोहे में कहा है कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयों को देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने अंदर झांक कर देखा तो मैंने महसूस किया कि मुझसे तो बुरा कोई इंसान नहीं है|  मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा इंसान हूं। इसका मतलब हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं लेकिन अगर आप खुद के अंदर झांक कर देखेंगे तो पाएंगे कि हम से बुरा कोई इंसान है ही नहीं|

6]   सुख में सुमिरन सब करे,   दुख  में करे न कोई

जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय|

 अर्थ– एक दोहे में ऐसा कहा गया है कि दुख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में वह इंसान ईश्वर को भूल जाता है| अगर सुख में भी ईश्वर को याद करते रहोगे तो दुख कभी आएगा ही नहीं लेकिन यह बात हमेशा इंसान भूल जाता है|

7] माटी कहे कुम्हार से,  तु क्या रौंदे मोहे

      1 दिन ऐसा आएगा,  मैं रोदूंगी तोहै|

 अर्थ — इस दोहे का यह मतलब है कि जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को  लगता है तो मिट्टी कुम्हार से कहती है–  तू मुझे  ऊपर नीचे कर  रहा है 1 दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिट्टी में विलीन हो जाएगा और मैं खुद तुझे उसके अंदर दफन कर दूंगी|

8] यह  तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान

     शीश दियो जो गुरु मिले,  तो भी सस्ता जान|

 अर्थ– इस दोहे का मतलब है कि यह जो शरीर होता है वह विष जहर से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान होता है| अगर आप शीशे सर देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिल जाए तो यह सौदा बहुत सस्ता है क्योंकि उस सच्चे गुरु के आने से आपका जीवन बिल्कुल परिवर्तित हो सकता है|

9] सब धरती कागज करूं,  लेखनी सर वनराज|

      सात समुद्र की मसि  करो, गुरु के गुण लिखा न जाए|

 अर्थ– इस दोहे का तात्पर्य है कि अगर मैं पूरी धरती के बराबर बड़ा कागज बनाओ और दुनिया के सभी देशों की कलम बना लूं तथा सातों समुद्रों के बराबर  ही बना लूं तो भी  गुरुओं को लिखना संभव नहीं है क्योंकि गुरु हमेशा गुणों की खान होते हैं|

10] चलती चक्की देख के,  दिया कबीरा रोय

       दो पाटन के बीच में,  साबुत बचा न कोई|

 अर्थ– चलती हुई चक्की को देखकर कबीर दास जी के आंसू निकल आते हैं और वह कहते हैं कि चक्की के पाटों के बीच में कुछ भी साबुत नहीं बचता|

11] काल करे सो आज कर,  आज करे सो अब 

पल मैं प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब| ( kabir das ke dohe

 अर्थ– कबीर दास जी के अनुसार हमारे पास समय बहुत कम होता है इसीलिए जो काम कल करना है उसे आज कर लेना चाहिए और जो काम आज करना है उस काम को अभी कर लेना चाहिए|  क्योंकि पल भर में जो प्रलय आ जाएगी तो आप अपने काम नहीं कर पाएंगे और पछताने लगेंगे|

12] जहां दया तहां धर्म है,  जहां  लोभ वहां  पाप

जहां क्रोध तहां काल है, जहां छमा वहां आप|

 अर्थ– कबीर जी कहते हैं कि जहां दया होती है, उसी जगह पर धर्म होता है और जहां लोग होता है वहां पाप होता है| जहां पर क्रोध है वहां पर हमेशा सर्वनाश ही होता है और जहां क्षमा है वहां ईश्वर का वास होने लगता है|

13]  जो हट प्रेम न  संचार,  जो घाट  जान सामान

जैसे खाल लोहार की, सांस लेत बिन प्राण|

 अर्थ– दोहे के अनुसार जिस  इंसान के अंदर दूसरों के प्रति प्रेम की भावना नहीं होती है वह हमेशा जानवर के समान होता है|  क्योंकि किसी भी इंसान के अंदर प्रेम की भावना होना बहुत ही जरूरी होती है|

14] जल में बस कमोदिनी,  चंदा बसे आकाश

जो है जागो भावना, सो ताही के पास

 अर्थ– इस दोहे के अनुसार, कमल जल में खिलता है और चंद्रमा हमेशा आकाश में ही रहता है लेकिन चंद्रमा की छाया हमेशा पानी पर पड़ती है जिससे ऐसा देखा जाता है कि दोनों के बीच में दूरी होने के बाद भी हमेशा पास नजर आते हैं|  जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब कैसा दिखाई देता है जैसे चंद्रमा खुद कमल के पास आ गया हो वैसे ही जब कोई इंसान के दिल में ईश्वर के लिए असीम प्रेम होता है, तो ईश्वर स्वयं चलकर उसके पास आ जाते हैं|

15] जीवन में मरना भला,  जो मरी जाने कोई

मरना पहले जो मरे, अजय अमर सो होय|

 अर्थ– इस दोहे के अनुसार जीते जी मरना अच्छा है,  यदि कोई मर ना जाने तो|  मरने के पहले ही जो मर लेता है वह अजर अमर हो जाता है|  शरीर रहते-रहते जिसके समस्त अहंकार समाप्त हो जाए वे वासना विजई जीवन मुक्त होते हैं|

16] मैं जानू  मन मरी गया,  मरी के हुआ भूत

मुझे पीछे उठी लगा, ऐसा मेरा पुत्त|

 अर्थ– इस दोहे के अनुसार भूलवश मैंने ऐसा जाना कि मेरा मन भर गया है परंतु वह तो मर कर भी भूत बन चुका है। मरने के बाद भी उठकर मेरे पीछे लगा रहा ऐसा यह मेरा मन बालक की तरह देखो हो गया है|

17]   धीरे धीरे रे मना,  धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय|

 अर्थ– कबीर जी कहते हैं कि किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए एक उचित समय सीमा की आवश्यकता हो जाती है उस समय से पहले कभी भी कोई कार्य नहीं हो सकता|  इसलिए हमें अपने मन में हमेशा धैर्य बनाकर करना चाहिए और अपने काम को पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए|  जिस प्रकार यदि माली किसी पेड़ को 100  घड़े  पानी देने लगे तभी भी ऋतु के आने पर ही उस मालिक को फल मिलेगा उसी प्रकार हमें भी धीरज रखते हुए अपने सारे कार्य को करते रहना चाहिए और समय पर फल की प्राप्ति अवश्य होती है|

18] लूट सके तो लूट ले,  राम  नाम की लूट

पीछे फिर पछताओगे, प्राण जाए जब छूट|

 अर्थ– इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक तुम जिंदा हो ईश्वर का नाम लेते रहो और उसकी पूजा करते रहो नहीं तो मरने के बाद तुम्हें इस बात पर पछतावा होने लगेगा|

19] अति का भला न बोलना,  अति की भली न चूप

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप|

 अर्थ– कबीर दास जी ने कहा है कि जिस प्रकार जरूरत से ज्यादा बारिश हानिकारक होती है और जरूरत से ज्यादा धूप भी सभी के लिए नुकसानदायक है उसी प्रकार हम सबका ना तो बहुत ज्यादा बोलना सही होता है और ना ही बहुत अधिक और देर तक चुप रहना ठीक कहा जाता है|  हम जो कुछ भी बोलते हैं वह बहुत ही अनमोल होता है इसलिए हमेशा हमें सोच समझकर और कम शब्दों में बोलना चाहिए|

20] पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,  पंडित भया न कोई 

ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय|

 अर्थ– इस दोहे के अनुसार कबीर जी कहते हैं कि इस दुनिया में न जाने कितने लोग आए और मोटी मोटी किताबों को पढ़ते हुए चले गए पर कोई भी सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाया है|  सच्चा ज्ञानी तो हमेशा वही इंसान हो सकता है जिसने प्रेम  पढ़ लिया हो अर्थात जो प्रेम का वास्तविक रुप से जानकार हो इस जगत में कई ऐसे लोग हैं, जो कई मोटी किताबों को पढ़ लेने के बाद ही सच्चे प्रेम की तलाश नहीं कर पाते हैं| 

अंतिम शब्द

इस प्रकार से दोहों के माध्यम से हमने जाना कि कबीर जी हमेशा ऐसी बातों को लिखा करते थे, जो सीधा ही मन मस्तिष्क में प्रवेश करते हुए  एक  नया ज्ञान दे जाते थे|  इसके माध्यम से जीवन  को एक नई दिशा दी जा सकती है और सकारात्मक रूप से आगे बढ़ा जा सकता है|  ऐसे में अपने आसपास के होने वाले परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए खुद के अंदर भी बदलाव को लाकर प्रेम भावना से आगे बढ़ना ही सच्चे मनुष्य का कर्तव्य होता है| 

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