रहीम का जीवन परिचय | Abdul Rahim Khan

Abdul Rahim Khan का जीवन परिचय

भारत के इतिहास में आज तक ऐसे कई महान कवियों ने जन्म लिया है इन्होंने अपने आदर्शों के माध्यम से लोगों को नई दिशा दी है|  अगर मध्यकालीन युग की बात की जाए  तो उस समय कई सारे ऐसे महान प्रशासक, कलाप्रेमी मिल जाते हैं जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से ना केवल प्रजा बल्कि  राजा का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी|  इस प्रकार के लोग  बहु मुखी प्रतिभा के धनी थे|  ऐसे में आज हम जिस महान इतिहासकार और प्रशासक की बात कर रहे हैं, उनका नाम है रहीम|

Abdul Rahim Khan

 आपको Abdul Rahim Khan के बारे में सारी जानकारी बताने जा रहे हैं,  उम्मीद करते हैं आपको पसंद आएगी|

कौन है Abdul Rahim Khan

Abdul Rahim Khan मध्यकालीन युग के महान प्रशासन, दानवीर, सेनापति, कवि, बहु भाषा, कलाप्रेमी और विद्वान थे|  उनका पूरा नाम Abdul Rahim Khan-i-Khanan  था। वे भारतीय संस्कृति के महान परिचायक है उन्होंने हर धर्म के लोगों की मान्यताओं को  स्वीकार  किया था|  उन्होंने समाज सुधारक के रूप में भी काफी हद तक कार्य किया था| 

Abdul Rahim Khan का जन्म

 Abdul Rahim Khan का जन्म 17 दिसंबर 1556 को दिल्ली में  हुआ। उनके पिता का नाम  बैरम खान था,  जो अकबर के शिक्षक रह चुके थे |  उनके पिता को खाने खाना की उपाधि से सम्मानित किया गया था रहीम की मां का नाम सुल्ताना बेगम था|  जब रहीम 5 वर्ष के थे, उसी समय उनके पिता की मृत्यु हो गई थी इसके बाद अकबर ने रहीम का पालन पोषण अपने धर्म पुत्र के रूप में किया| रहीम को  अकबर ने ‘’ मिर्जा  खान’’ की उपाधि  दी थी| 

शिक्षा

Abdul Rahim Khan की शिक्षा दीक्षा  अकबर के सानिध्य में पूरी हुई।  जहां पर मुल्लाह मोहम्मद अमीन ने रहीम को कई सारी भाषाओं का ज्ञान कराया जिसमें तुर्की, अरबी, फारसी  मुख्य रूप से शामिल थे|  उन्होंने ही रहीम को  दूसरी  शिक्षा   दिए जिनमें  कविता,  तर्कशास्त्र, भारती व्याकरण का ज्ञान कराया और   छंद रचना करना भी सिखाया था| इसके साथ ही साथ उन्होंने हिंदी साहित्य में भी ज्ञान प्राप्त किया  जिसकी बदौलत उन्होंने कई सारी रचनाओं का निर्माण किया|

विवाह

अकबर ने रहीम  की शिक्षा दीक्षा पूर्ण कर दी उसके बाद उन्होंने रहीम का विवाह अजीज कोका की बहन   महा बानो से करवा दिया|  इस विवाह के होने के बाद  से संबंध  मधुर हो गए और पुरानी दुश्मनी खत्म हो  गई|  रहीम का विवाह  लगभग 13 वर्ष की उम्र में कर दिया गया और उसके बाद उनकी 10  संतान हुई| 

रहीम की मृत्यु

 Abdul Rahim Khan की मृत्यु सन 1626 ईसवी में  70 वर्ष की अवस्था में हो गई थी। दिल्ली में स्थित खानखाना के नाम से प्रसिद्ध मकबरे में रहीम को दफनाया गया था जहां उनकी पत्नी को भी दफनाया जा चुका था|  मकबरे का निर्माण स्वयं रहीम ने अपनी पत्नी के लिए किया था| 

Abdul Rahim Khan हिंदू देवी देवताओं के भक्त के रूप में जाने गए

Abdul Rahim Khan जन्म से ही मुसलमान थे इसके बावजूद भी उनके मन में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति अपार  भक्ति भावना देखी  गई थी|  उन्होंने हमेशा ही हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार  अपना जीवन यापन करने की कोशिश की  और पूरी ईमानदारी के साथ अपना ध्यान हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में  लगाए  रहते थे|  रहीम के काव्य रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों में भी  अपना काम किया है और लोगों को इन महान ग्रंथों की महत्वता को समझाने की कोशिश की है| उनके दिल में हमेशा सारे धर्मों के लिए विशेष प्रेम और लगाव देखा गया है|

Abdul Rahim Khan को मिला मीर अर्ज का पद

अकबर ने रहीम को अपने राज दरबार में विशेष  सम्मान दिया था और साथ ही साथ अकबर ने ‘’मीर अर्ज’’ का पद भी रहीम को दिया| यह एक ऐसा पद था जिसे पाकर कोई भी व्यक्ति सातवें आसमान पर पहुंच सकता था क्योंकि इस पद के माध्यम से  नगर का संदेश पहुंचाया जाता था|  जो भी फैसला राजा जनता के हित में  लेते थे वह इस पद के माध्यम से  करते थे|  सम्राट अकबर का कार्य सही तरीके से चल  सके  इसीलिए  सम्राट  अकबर ने अपने विश्वास पात्र रहीम को  यह महत्वपूर्ण पद दिया और जिसे रहीम ने भी बहुत अच्छे तरीके से कार्य करते हुए पद की गरिमा को बनाए रखा|Raskhan | रसखान का जीवन परिचय

रहीम की प्रमुख रचनाएं

  1. रहीम दोहावली
  2.  नायिका भेद
  3.   मदन  आषतक
  4.  नगर  शोभा
  5.  रास पंचाध्याई

उन्होंने  तुर्की भाषा में  बाबर की  आत्मकथा का फारसी  में अनुवाद किया है और साथ ही साथ अकबर के जीवन के बारे में भी ‘’आईने अकबरी’’ में संपूर्ण वर्णन किया गया है|

भाषा शैली

Abdul Rahim Khan की रचनाओं की भाषा शैली हमेशा अवधी और ब्रज भाषा में होती थी जिसे समझना आसान होता था। इसके साथ ही साथ काव्य में श्रृंगार रस, शांत रस और   हास्य  रस  मिलते थे|  साथ-साथ उनकी रचनाओं की खूबसूरती दोहा, सोरठा, कविता और   के माध्यम से की जाती थी| उनकी ब्रजभाषा अत्यंत सरल और व्यावहारिक होती थी जिसे आसानी से समझा जा सकता है | उनकी रचनाओं में होने वाले अवधी भाषा का प्रयोग ही अत्यंत सरलता के साथ  किया गया है|  उनके  काव्य रचनाओं में मुक्तक मुख्य रूप से  विद्यमान रहती है जो कि अत्यंत सरल है|

रहीस के कुछ प्रमुख दोहे

रहीम ने कई सारे  दोहे की रचना की है|  इनमें से हम कुछ प्रमुख दोहे के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आज भी लोगों को याद है और  जिनको आज भी लोगों के द्वारा पसंद किया जाता है|

1]    बानी ऐसी बोलिए,  मन का आपा खोए

       औरन को शीतल करे,  आपहु शीतल होय|

 अर्थ– इस दोहे का मतलब है कि अपने भीतर के घमंड को दूर करके ऐसी मीठी बातें हम सभी को करनी चाहिए जिससे सुनने वाला और हम खुद खुश हो सके और  हमेशा मीठी वाणी का पालन करें|

2]   दोनों रहिमन एक से,  जो लो बोलत नाही

       जान परत हैं काक पिक,  रितु बसंत के माही|

 अर्थ– इस दोहे का तात्पर्य है कौवा और कोयल एक समान रूप से काले रंग के होते हैं|  हम उनकी पहचान नहीं कर सकते जब तक उनकी आवाज सुन नहीं लेते लेकिन जैसे ही बसंत ऋतु आ जाती है, तो दोनों के बीच का अंतर आसानी से पता चल जाता है क्योंकि कोयल की आवाज मीठी होती है और सुरीली होती है लेकिन कौवे की आवाज बहुत ही कर्कश होती है|

3]     बड़ा हुआ तो क्या हुआ,  जैसे पेड़ खजूर

          पंथी को छाया नहीं,  फल लागे अति दूर|

 अर्थ– रहीम   के  अनुसार  इस दोहे का मतलब  है कि बड़े होने का मतलब  सभी के लिए अच्छा नहीं होता है। जिस प्रकार खजूर का पेड़ बहुत बड़ा होता है लेकिन इसके फल इतने ज्यादा दूर होते हैं कि तोड़ना मुश्किल हो जाता है और फिर मुसाफिरों के लिए छांव भी नहीं हो पाती है। 

4]     रहिमन चुप हो बैठिए,  देखें  दिन के  फिर

         जब नीके  दिन आइए,  बनत ना लगी है   देर|

 अर्थ– रहीम कहते हैं कि जब खराब समय चल रहा हो तो मौन रहना ही ठीक होता है क्योंकि जब अच्छा समय आ जाता है तब काम बनते देर नहीं होती इसीलिए हमेशा सही समय का सब्र रखें|

5]     रहिमन धागा प्रेम का,  मत  तोड़ो चटकाय

         टूटे से फिर ना जुड़े,  जुड़े गांठ पड़ जाए|

 अर्थ– इस दोहे का मतलब है की प्रेम का संबंध बहुत ही ज्यादा नाजुक होता है इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता है। यदि धागा एक बार टूट जाता है, तो इसे छोड़ना बहुत मुश्किल होता है और अगर यह जुड़ जाता है, तो हमेशा एक गांठ बंधी होती है। वैसे ही आपसी संबंध टूट जाने पर जुड़ते नहीं है और जुड़ते भी हैं, तो मन में एक दरार पड़ी रह जाती है|

6]     दुख में सुमिरन सब करें,  सुख में करे न कोई

        जो सुख में सुमिरन करे,  तो दुख काहे को होय|

 अर्थ– रहीम के इस दोहे का मतलब है कि संकट में हर कोई भगवान को याद करने लगता है और अपने दुखों को कम करने की गुजारिश करता है लेकिन खुशी में कोई भी भगवान को याद नहीं रखता। अगर आप खुशी जीवन में भी भगवान को याद करेंगे तो आपको दुख होगा ही नहीं|

रहीम शहजादा सलीम की कहानी

ऐसा माना जाता है कि राजा अकबर की कई सालों तक कोई संतान नहीं हुई। कई वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई  और जिसका नाम सलीम रखा गया| सलीम को माता पिता और अन्य सभी लोगों से बहुत ज्यादा प्यार दुलार मिल गया था और इस वजह से उनका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। राजा अकबर ने चिंतित होकर कई प्रकार के शिक्षकों को बुलाया जिसमें राज्य के नामी-गिरामी शिक्षक भी शामिल थे लेकिन किसी की कोशिशों के बावजूद शहजादे सलीम का मन पढ़ाई में नहीं लग पा रहा था अंत में अकबर ने रहीम को बुलाकर  सलीम की सारी शिक्षा संबंधी जिम्मेदारियां रहीम को दी थी जिसे पाकर  रहीम बहुत खुश थे और उन्होंने अपना यह काम भी बखूबी निभाया और सलीम को सही राह पर लाने का काम किया|

कैसे हुई रहीम के पिता की मृत्यु

रहीम के पिता बैरम खान एक बार हज यात्रा करने के लिए निकले थे और गुजरात के पाटन में ठहरे हुए थे। जैसे तालाब से  नहा कर बाहर निकले तो उनके ही एक दुश्मन मुबारक खान ने उनकी पीठ में छुरा भोंक कर उन्हें मृत्यु दे दिया था लेकिन बैरम खान की पत्नी सुल्ताना बेगम  बचते हुए अहमदाबाद आ गई थी। जैसे अकबर को इस घटना के बारे में मालूम पड़ा उन्होंने सुल्ताना बेगम को दरबार वापस आने के लिए कहा और ऐसे समय में अकबर ने रहीम से कुछ भी बताने के लिए मना किया था उन्होंने कहा था कि रहीम को हर प्रकार से खुश रखा जाए और उनके पिता का साया सिर से उठ गया है इस बारे में जानकारी ना दी जाए और धीरे-धीरे इस प्रकार से रहीम की सारे पालन पोषण का  जिम्मा महाराजा अकबर ने उठा लिया था|

अंतिम शब्द

इस प्रकार से हमने जाना ही रहीम ने अपने जीवन में कई सारे ऐसे काम किए थे जिनकी वजह से उनका नाम आज भी गर्व के साथ लिया जाता है| उन्होंने हमेशा अपनी इमानदारी राजा अकबर के प्रति रखी और हर कदम पर उनका  साथ  दिया| लोगों के मन में भी उनके प्रति श्रद्धा भाव था और इस वजह से उनके लिखे गए दोहे हमेशा लोगों को पसंद आ गए|  उनके  दोहे से प्रेरणा मिलती है, जो जीवन की सच्चाई को बताती है|  रहीम  सुलझे हुए व्यक्तित्व के इंसान थे  और इस वजह से हमेशा सभी के चहेते बने रहे|

 उम्मीद करते हैं आपको हमारा  यह लेख  पसंद आएगा धन्यवाद| 

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