आदिकाल | aadikaal के कवि और उनकी रचनाएँ

क्या है आदि काल, जाने पूरी जानकारी 

भारत के इतिहास के हजारों वर्षों में कई ऐसे तत्व  हमें मिल जाते हैं जिनसे हम आज भी  भारतीय इतिहास के बारे में सही और सटीक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं|  जहां तक हिंदी साहित्य की बात है, तो आज तक कई सारे लेखक और कवि इतिहास के पन्नों से हमें मिलते हैं जो हमें  आदि काल के बारे में भी सही जानकारी देते हैं|  भारत में होने वाले विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान है और साथ ही साथ आने वाले विभिन्न समय ही अपनी अहम भूमिका निभाते हैं|

 हिंदी साहित्य का इतिहास बहुत ही बड़ा है जहां पर कई सारी कामयाबी  देखने को मिली है| भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों में मुख्य भूमिका aadikaal की भी रही है  जिनसे हमें पूर्वजों के बारे में भी सही जानकारी मिल रही है|  आज हम आपको  aadikaal के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं अतः हमारा आपसे अनुरोध है कि आप हमारे लेख को  अंत तक  पढ़ें|

आदिकाल [ aadikaal ] की शुरुआत

aadikaal

अगर हम इतिहास के पन्नों में aadikaal की खोज करें तो यह पता चलता है कि आदिकाल की शुरुआत आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी  के मध्य हुआ है जिसे डॉक्टर हजारी  प्रसाद द्विवेदी ने नाम दिया था। इसके बाद अलग-अलग लेखकों के माध्यम से अपने हिसाब से नाम दिया गया इसे वीरगाथा काल   या वीरकाल के रूप में भी जाना जाता है|  ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको उस समय की कई सारी ऐसी पुस्तके मिल जाती हैं जिनसे आप अपने ज्ञान को बढ़ा सकते हैं|

aadikaal साहित्य की मुख्य बातें

आठवीं शताब्दी में जब आदि काल साहित्य की रचना की जा रही थी  उस समय इतिहासकारों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा। आदिकाल के समय में लगभग 500 वर्षों से भी ज्यादा समय  लगा जब हिंदी साहित्य का असली मायनों में गठन हो रहा था। हिंदी साहित्य के इतिहास में यह देखा गया कि जब भी कोई संरचना लिखी जाती थी तब वह जानकारी अपूर्ण और पर्याप्त होती थी|  आदिकाल का  असली समय  1050  से 1575 ईसवी तक निर्धारित किया गया|

आदिकाल में लिखे गए प्रमुख रासो ग्रंथ

aadikaal का समय  इतिहास कारों के लिए  महत्वपूर्ण साबित हुआ और उस समय कई सारे रासो ग्रंथ का निर्माण किया गया जो आज भी  उस समय का इतिहास  हमें  बताता है| कुछ प्रमुख रासो ग्रंथ निम्न  है–

  1. विजयपाल रासो
  2.  हम्मीर रासो
  3.  खुमान रासो
  4.  बीसलदेव रासो
  5.  पृथ्वीराज रासो
  6.  परमाल रासो
  7.  कीर्ति पताका
  8.  पदावली
  9.  जैन साहित्य
  10.  सिद्ध साहित्य

आदिकाल या वीरगाथा काल की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय इतिहास में aadikaal की बात करने से आपको कई प्रकार की ऐसी बातें पता चलती है जो आज तक बताया नहीं गया है  या कहीं न  कही  छिपी   हुई है|   उस समय का सामाजिक दृष्टिकोण  बहुत ज्यादा कारगर नहीं  था और इसे धार्मिक दृष्टि से सही नहीं माना गया था|  इसके बावजूद भी इस काल की कुछ मुख्य  विशेषताएं देखी गई है |

  1. ऐतिहासिक दृष्टिकोण का अभाव होना– जब भी आप aadikaal की बातें करते हैं,  तो  आपने  महसूस किया होगा कि इस काल में  कुछ प्रमुख चरित्र नायकों को  विशेष स्थान नहीं दिया गया है लेकिन कहीं  उन का ऐतिहासिक वर्णन नहीं हुआ है|  इस वजह से ऐतिहासिक दृष्टिकोण का पूर्ण रूप से अभाव देखा गया है। आप गौर करेंगे कि इस काल में  ऐतिहासिक गतिविधियों से ज्यादा कल्पना की प्रधानता देखी गई है जिसमें कवियों और लेखकों ने अपने हिसाब से कार्य को अंजाम दिया है|
  2. होने वाले युद्ध का वर्णन करना– आदिकाल में  लिखे गए ग्रंथों में हमेशा युद्धों का सही रूप से वर्णन किया जाता रहा है|  जो पढ़ने में बहुत ही ज्यादा  सजीव और सरल जान पड़ते हैं लेकिन  वास्तव में इनमें थोड़ी  व्यावहारिकता भी देखी जा सकती है|
  3. राष्ट्रीयता का अभाव होना– इस प्रकार की रचनाओं में हम देखेंगे कि राष्ट्रीयता का पूर्ण रूप से अभाव होता है जहां पर कवियों और लेखकों को आश्रय दिया जाता है  और उनके काम को खास तवज्जो नहीं दिया जाता था|
  4.  काव्य के अलग रूप होना–  aadikaal में कई प्रकार की रचनाओं को देखा जाता है,  जो पढ़ने और सुनने में अच्छे लगते हैं|  लेकिन इस  काल में मुक्तक तथा प्रबंध दो प्रकार की रचनाओं को मुख्य रूप से देखा जाता है|  इसके अलावा जैन साहित्य में चरित्र साहित्य, पुराण साहित्य, राम काव्य, कृष्ण काव्य, रोमांटिक काव्य  देखने को मिलते हैं जो लोक साहित्य  को बताते हैं|
  5. कई प्रकार के छंदों का उपयोग करना– जब भी आप आदि काल के समय के घटनाओं का अध्ययन करेंगे तो आप महसूस करेंगे कि उस समय कई प्रकार के छंदों का उपयोग किया जाता था। जिनमें मुख्य रुप से दोहा, रोला, तोमर,  आर्य इस  काल  के मुख्य  छंद है|
  6. आश्रय दिए जाने वालों की नियमित रूप से प्रशंसा करना– इस काल के कवियों ने खुद को आश्रय देने वाले को बहुत बड़ा चढ़ाकर प्रशंसा की है|  इस काल में अपने विरोधियों को नीचा दिखाने की खास परंपरा देखी गई है|  इसके अलावा कई प्रकार की समस्या देखी गई जो मानव हित में काम नहीं आ रही थी|

आदिकाल में सांस्कृतिक महत्व का होना

aadikaal में सांस्कृतिक महत्व बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। जिससे खुद के देश के अलावा विदेशों के भी लेखकों को अपनी और आकर्षित किया है। धीरे-धीरे सांस्कृतिक  रूप  बढ़ता ही चला गया|  उस समय के संस्कृति का भी कई जगह पर वर्णन किया गया है इससे पता चलता है कि सांस्कृतिक महत्व काफी ज्यादा था | इस बात से  अंदाजा लगाया जा सकता है कि  आदि काल में भी रचा गया साहित्य  बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण था|

आदि काल में हुआ हिंदी कविता का प्रारंभिक रूप की शुरुआत

ऐसे तो आदि काल में हमेशा  साहित्य को प्रमाणित करने में समय लगा  इसके बावजूद भी  इसका आरंभ  कुछ मुख्य कविता से ही हुआ है| हिंदी को पहले  सभी भाषाओं के लिए महत्वपूर्ण और ऊपर माना गया|  इसके साथ ही हिंदी साहित्य को भी एक नई जगह मिली  और हिंदी में  मुद्रण का सही तरीके से प्रचार प्रसार हुआ|  सामान्य जनता को जागरूक करने के लिए  हिंदी साहित्य का योगदान माना गया|  हिंदी भाषा लिखित रूप में भी अपने असली मायनों में  साथ रहा जिससे लिखी गई बात को पढ़कर समझने में कोई दिक्कत नहीं महसूस हुई|

aadikaal की कुछ प्रमुख प्रवृत्तियां

aadikaal के समय में प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में वीर रस को माना जाता है और इसीलिए  आदिकाल को वीरगाथा काल के नाम से भी जाना जाता है| इसके अंतर्गत लेखकों को राजा की तारीफ करने के लिए   दबाव  किया जाता था और अपनी कविताओं में  कवि  बढ़-चढ़कर अपने राजा का गुणगान किया करते थे| उस समय की कविताओं में  वीर रस का भी काफी हद तक योगदान देखा गया था|  उस समय राजा छोटे छोटे राज्यों पर  आक्रमण   करके राज किया करते थे और  आदिकाल की रचनाओं को पसंद भी किया करते थे| 

आदिकाल में किया गया डिंगल भाषा का प्रयोग

इस काल में मुख्य रूप से डिंगल भाषा का उपयोग किया जाता था जिसे राजस्थान की साहित्यिक भाषा के रूप में भी जाना जाता है| इसके अलावा  इस भाषा का उपयोग सामान्य जनता के द्वारा किया गया वहीं कुछ लोग इसे अपभ्रंश भाषा के नाम से ही जानते हैं|  जहां पर अलग-अलग भाषाओं का एक रूप बनाकर अपभ्रंश कर दिया गया उसे ही अपनी रचनाओं में विशेष स्थान दिया गया|  यह भाषा  उस समय  की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के रूप में जाना गया, जिनका उल्लेख साहित्य किताबों में भी देखा जाता है| 

अंतिम शब्द

इस प्रकार से हमने देखा कि आदिकाल का वह समय था, जब सारे कवियों का विकास हुआ और लोगों को भी उनकी   यह भाषा  आसान लगने लगी| आदिकाल के समय में  ऐसी रचनाओं का विकास हुआ जो आज भी लोगों को याद है|  उस समय के हिसाब से कई प्रकार की दिक्कतें देखने को मिली लेकिन धीरे-धीरे उन दिक्कतों पर काबू पा लिया गया और आसानी से ही बातों को समझा जाने लगा|  आदिकाल को समस्त कार्यों में महत्वपूर्ण माना जाता है और इस ज्ञान को बढ़ाने के लिए कई प्रकार की पुस्तकें उपलब्ध हैं जिनसे  आदिकाल के बारे में उचित जानकारी दी जा सकती है|

 उम्मीद करते हैं आपको हमारा लेख पसंद आया होगा और बताई गई जानकारी  अच्छी लगी होगी|

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